आभास

वो एक रात थी तारों की बारात थी मै था अकेला और खुद से की बात थी हमारी क्या औकात थी ये जिंदगी जो एक सौगात थी भीड़ मे था तन्हा और सायों की ही जमात थी एक कलम के सिपाही के लिखने की क्या औकात थी जब घूम ली थी पूरी दुनिया तो की … Continue reading आभास

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सृष्टि है वो अपनेआप मे

सृष्टि है वो अपनेआप मे घटाओं जैसे बालों से घिरी हुई बर्फ जैसी रंगत है, सीप जैसी पलकों में नीलम जैसी आँखें हैं, गुलाब जैसे होठों में मोती जैसे दांत, फूलों जैसे गाल हैं और कमल जैसे अंग, बच्चों जैसी हँसी और लहरों जैसी अदाएं, प्यार से भी प्यारी है वो !! Regenerated in English: She is creation … Continue reading सृष्टि है वो अपनेआप मे